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29-03-2017

पश्चिम बंगाल। बांग्लादेश के बॉर्डर से 10 किलोमीटर पहले पश्चिम बंगाल के मधुसूदनकाठी गांव के लोग आर्सेनिक के मरीज बन चुके हैं। यहां की लगभग पूरी आबादी गंभीर बीमारी के मरीज हो चुके हैं। ऐसा कोई महीना नहीं कि इस गांव से एक अर्थी न उठती हो। किसी के हाथ काटने पड़े तो किसी को पैर गवाना पड़ा है। इस समस्या से निदान के लिए सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन आगे आया है और गांव में ड्रिंकिंग वाटर प्लांट लगाकर लोगों को शुद्ध पानी मुहैया करवा रहा है।

अपने घाव दिखाता हुआ निवासी

 

यहां के निवासी और पीड़ित डॉ दिलीप सरकार कहते हैं कि हमें यह परेशानी वर्ष 2007 से शुरू हुई। डॉक्टर से दिखाया तो पता चला कि आर्सेनिक की समस्या है। हमारे पास मज़बूरी यह थी कि गांव में पीने के लिए यही पानी उपलब्ध है। दूसरे पीड़ित रतन सरदार कहते हैं कि इस बीमारी की वजह से हमारे हाथ काटने की नौबत आ गई। 

इस गांव में वाटर प्लांट लगाने वाली संस्था सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. बिंदेश्वर पाठक कहते हैं कि हम आर्सेनिक की समस्या पर काफी दिनों से काम कर रहे हैं और ऐसे गांव की तलाश में थे, जहां इस तरह की समस्या हो। इसी खोज में मधुसूदन काठी गांव मिला, जहां हमने प्लांट लगाया और यहाँ के पानी को 50 पैसे प्रति लीटर गांव में भेजना शुरू किया। जिसे पीने से लोगों को फायदा पहुंचने लगा। लोगों की बीमारी कम होने लगी है। उन्होंने बताया कि हम इस तरह की समस्या वाले गांव में वाटर प्लांट लगाने का काम जारी रखेंगे। उन्होंने बताया कि आर्सेनिक बीमारी से ग्रसित इस गांव के करीब 10 किलोमीटर क्षेत्र की आबादी को यहां का पानी सप्लाई किया जाएगा। अभी यह प्लांट मधुसूदनकाठी के अलावा मेदिनीपुर, मेहनती, हरिदासपुर, मुर्शिदाबाद, सुवासग्राम और मायापुर में लगाया गया है।

Source : http://m.hindi.eenaduindia.com/States/North/Delhi/2017/03/29210655/Arsenic-patients-in-West-Bengal-village.vpf

 

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Tue, Mar 28 2017

West Midnapore: Sociologist and founder of Sulabh International Dr.Bindeshwar Pathak pours drinking water to a live model in West Midnapore district of West Bengal on March 28, 2017. Sulabh inaugurated a project where pure drinking water will be made available to villagers in arsenic affected areas at negligible prices.

West Midnapore: Sulabh inaugurates drinking water project in WB - Bindeshwar Pathak West Midnapore: Sulabh inaugurates drinking water project in WB - Bindeshwar Pathak West Midnapore: Sulabh inaugurates drinking water project in WB - Bindeshwar Pathak

Source : http://www.prokerala.com/news/photos/west-midnapore-sulabh-inaugurates-drinking-water-project-in-wb-222851.html#photo-1

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Hindustan Hindi News

गुरुग्राम. मुख्य संवाददाता

24-03-2017

आचार्य निशांतकेतु सचल शब्दकोश : डा. विंदेश्वर पाठक

आचार्य निशांतकेतु एक सचल शब्दकोश हैं। मैंने जब भी उनसे कोई जिज्ञासा की, मुझे तुरत समाधान मिला। उनकी जिह्वा पर स्वयं सरस्वती विराजमान रहती हैं। वे शब्द-मनीषी हैं। यह विचार सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक पद्मभूषण डॉ. विन्देश्वर पाठक व्यक्त किए। वे गुरुवार को आचार्य निशांतकेतु के पालम विहार में आयोजित 83 वें जन्मदिवस समारोह को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने उनके स्वस्थ दीर्घायुष्य की कामना की। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के अध्यक्ष बलदेव भाई शर्मा ने उन्हें ऋषि-परंपरा का व्यक्तित्व कहा। उन्होंने उनके साहित्य में योगदान की विस्तार से चर्चा की। डॉ. नंदलाल मेहता ‘वागीश’ ने कहा कि आचार्य निशांतकेतु शब्द-शिल्पी हैं। पुरातन और अधुनातन के समन्वय-पुरुष हैं। डॉ. अरुण कुमार भगत ने उनकी उत्कृष्ट भाषण-कला की चर्चा की। पंडि़त सुरेश नीरव ने अपने स्वस्ति-पत्र में उन्हें साहित्य का हिमाद्रि-व्यक्तित्व की संज्ञा दी।

डॉ. मधुकर गंगाधर ने उनके छात्र-जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि हम दोनों आचार्य नलिन विलोचन शर्मा के शिष्य रहे पर मैं यथार्थवादी हो गया और निशांतकेतु शास्त्रीय परंपरा के साथ यथार्थबद्ध भी रहे। ये एक विलक्षण छात्र भी थे और गुरु भी। मगध विश्वविद्यालय बोधगया के हिंदी-विभागाध्यक्ष डॉ. जितेन्द्र वत्स, डॉ. रवि शंकर शर्मा,डॉ. राजेन्द्र नाथ मेहरोत्रा, देवेन्द्र कुमार बहल, रेवाड़ी के डॉ. रमेश चन्द्र शर्मा, डॉ. चन्द्रमणी ब्रह्मदत्त, ओंकारेश्वर पांडेय और प्रवासी संसार के संपादक राकेश पांडेय, जयप्रकाश विलक्षण, डॉ. पुष्पा सिंह बिसेन, सुनीता श्रुतिश्री, डॉ. प्रभा शर्मा, राधा, कांक्षा कौमुदी समेत 200 के करीब साहित्यकार एवं कवि उपस्थित रहे। सुलभ साहित्य अकादमी, अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, हरियाणा-प्रांत, अखिल भारतीय सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति, ग़ाज़ियाबाद एवं आर्यावर्त साहित्य-संस्कृति-न्यास, नई दिल्ली के संयुक्त तत्त्वावधान में ‘आचार्य निशांतकेतु दीर्घायुष्य-कामना-संगमनी’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

इन पुस्तकों को हुआ विमोचन
कार्यक्रम के दौरान आचार्य निशांतकेतु द्वारा संपादित पुस्तक ‘साक्षात्कार’, डॉ. जितेन्द्र वत्स द्वारा संपादित ‘आचार्य निशांतकेतु रचनावली’, डॉ. अशोक कुमार ज्योति की लिखित पुस्तक ‘निशांतकेतु की कहानियों में मानवतावादी संवेदना का प्रयोग-शिल्प’ और संपादित पुस्तक ‘निशांतकेतु की दलित-चेतना की कहानियां’ पुस्तक का लोकार्पण किया गया।

Source : http://www.livehindustan.com/news/gurgaon/article1-gurugram-patna-acharya-nishantkete-sulabh-international-dr-vindeshwar-pathak–752241.html

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स्रोत: न्यूज़ नेटवर्क      तारीख: 19-Mar-2017

 

ताजनगरी में शुरू हुआ ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया का राष्ट्रीय अधिवेशन
विभिन्न राज्यों से 200 ख्यातिप्राप्त साहित्यकारों की सहभागिता

आगरा। साहित्य और साहित्यकार में समाज को एक को दिशा देने की अद्भुत क्षमता होती है। यदि समाज शरीर है तो साहित्य उसकी आत्मा। जन्म से मृत्यु तक मनुष्य समाज जुड़ा रहता है, वह चाहकर भी समाज से अलग नहीं हो सकता है। मनुष्य समाज में रहकर अनेक प्रकार का अनुभव ग्रहण करता है एवं जब वह प्राप्त अनुभव को शब्द द्वारा अभिव्यक्त करता है तो वह साहित्य बन जाता है। और यही अभिव्यक्ति की शक्ति उस व्यक्ति को आगे चलकर साहित्यकार बना देती है। यह कहना है देश के जाने-माने साहित्यकार व सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन के संस्थापक डॉ. विन्देश्वर पाठक का।

शनिवार को ताजनगरी में साहित्यकारों के सबसे बड़े कुंभ आथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया का दो दिवसीय 42 वां राष्ट्रीय अधिवेशन प्रारंभ हुआ। उद्घाटन आथर्स गिल्ड के अध्यक्ष डॉ. विन्देश्वर पाठक, उपाध्यक्ष डॉ. सरोज गौरिहार व डॉ. सरोजिनी प्रीतम ने किया। महासचिव डॉ. एसएस अवस्थी ने संस्था की वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत की। मुख्य अतिथि कुलपति डॉ. अरविंद दीक्षित ने लेखकों को समाज को नई दिशा देने वाला बताया। समारोह में सुलभ इंटरनेशनल की वरिष्ठ उपाध्यक्ष अनीता झा, साहित्यकार अशोक रावत, कैप्टन व्यास चतुर्वेदी, डॉ.प्रणवीर चौहान, कवियत्री श्रुति सिन्हा, कमल आशिक, डॉ. रूचि अग्रवाल, महेश शर्मा, संजय तौमर, डॉ. रामअवतार शर्मा, प्रो. सोम ठाकुर, डॉ. अलका सेन आदि उपस्थित रहे। संचालन आथर्स गिल्ड के समन्वयक डॉ. अमी आधार निडर ने किया।

42 पुस्तकों का विमोचन
समारोह में देशभर के लेखकों की करीब 42 पुस्तकों का विमोचन मंच से किया गया। अधिवेशन में तीन सत्रों में शोधपत्रों का वाचन हुआ। प्रतिनिधियों द्वारा निर्वाचन एवं प्रमुख संकल्प पत्रों को पारित कराया गया। कार्यक्रम स्थल पर आगरा के लेखकों की एक पुस्तक प्रदर्शनी आकर्षण का केंद्र बनी रही। अधिवेशन में देशभर के विभिन्न राज्यों के करीब 200 ख्याति प्राप्त लेखक हिस्सा ले रहें हैं।

Source : http://swadeshnews.in/Encyc/2017/3/19/up-agra-news-author-s-guild-of-india#

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सुलभ स्वच्छता के प्रणेता डॉक्टर बिंदेश्वर पाठक जी ने यह गीत समर्पित किया है भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को I प्रधानमंत्री जी द्वारा किये जा रहे तमाम जनहितकारी कार्यो का सुन्दर बखान किया गया है इस गीत में, जिसे लिखा और धुन दिया है स्वयं डॉ. पाठक ने

 

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Source : http://everylifecounts.ndtv.com/rejecting-age-old-taboos-widows-vrindavan-play-holi-11165

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Deepa Gupta | New Delhi

March 10, 2017 | 10:16 AM

Vrindavan, Braj Bhoomi, Vrindavan widows, Holi festival

Vrindavan windows celebrating Holi in 2016 (Photo: Himanshu Sharma/SNS)

The festival of colours is celebrated with great pomp and show by not only Hindu communities but by Non-Hindus too. The zeal of the festival can be seen all over India and in some other Asian countries as well. Vrindavan in India is a great option if you want to see and enjoy the finest Holi.
Vrindavan or Braj Bhoomi is the well-known place where Hindu deity Krishna spent his childhood playing with his beloved Radha and other Gopis. There is a story behind this colourful festival associated with Krishna and Radha. Lord Krishna was of dark complexion and Radha was very fair. So, he was always jealous of her and complained his mother Yashoda about this injustice of nature making him black and Radha fair. To pacify him, the doting mother asked him to apply colour on Radha’s face in a playful way and change her colour complexion like himself. Krishna did the same. This prank gained popularity and mass acceptance. It evolved as a tradition and later the festival of Holi.
The festival of colours is here again. So far, you have been celebrating it with your near and dear ones. This year, make your Holi extraordinary special. Celebrating it in a unique way bringing smiles on faces of widows abandoned by their families and living in the temple town of Vrindavan for decades. You will experience gigantic satisfaction – guaranteed.
Vrindavan is known as the ‘abode of widows’ that shelters them. Breaking the age-old Indian traditions where the widows were barred from participating in Holi festivities, the widows of Pagal baba Widow Ashram at Braj started to play Holi with colours and flowers, singing and dancing in the name of Krishna. Although it started only two years ago, many students, scholars, social reformers, widows from Varanasi and tourists across the world joined them with full zest. With the effort of NGO Sulabh International, it has now become a grand four-day-long celebration where about thousands kilos of gulal and flower petals of rose and marigold are arranged for the event. The celebration takes place few days before Holi and is a great tourist attraction.
What to wait for? Do check the dates and make a visit there this time. Encourage your family and friends too to accompany you and spread happiness among destitute. You may take gifts and sweets along. Contribute your bit to serve a social cause. This kind of celebration truly depicts the victory of good over evil that is the real essence of the festival. Happy Holi to all!

Source : http://www.thestatesman.com/travel/capture-the-colourful-spectacles-of-vrindavan-widows-this-holi-1489120944.html

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The Tribune

HOLI SPIRIT

Vandana Shukla

For centuries, widows of Vrindavan knew of only one colour: white. It set them apart. Perpetually mournful, they had to beg and die nameless in a city where their gods were sought to be living. But life is not same each day, nor is it meant to be seen in emptiness of white. So, they chose colours. The Tribune’s photographer S. Chandan visits Vrindavan and shares some of the most beautiful human aspirations

THE WAY TO HOLI-NESS: As a symbol of care and liberation for the widows of Vrindavan, a grand festival is organised at Gopinath Bazar of the city. The participants sing and dance as they smear colours on each other. They also play Rasleela symbolising eternal love.

THE crowded Gopinath Bazar of Vrindavan became a moving canvas on March 9: over 2,000 people were splashed with colours of Holi. Ordinary people — sadhus, Sanskrit scholars, pundits and about 1,000 widows — entered the Old Krishna Temple courtyard barefoot and threw colours on each other. An age-old tradition disallowing widows to participate in joyous celebrations was thus broken — again in five years in a row.

The widows, a few of them barely able to move with the support of a walking stick, burst into songs. The scene looked like this: Gulal — over 1,500 kg of pink, yellow, green and red — was placed in the middle of the large courtyard as over 1,500 kg of rose and marigold petals added to the rich fragrance. They all danced.

The colours of Holi were not only meant to be seen. You could also hear the joyous strains of phag being sung in chorus. The atmosphere reverberated with traditional singing of dhamar on the accompaniment of dhol, pakhawaj, majeera, cymbals and harmonium, gradually moving on to more contemporary ‘holis’ like, aaj biraj me holi re rasiya. No recorded music, everyone sang.

“Bahut kuchh badal jaata hai (so much changes),” says Aruti Nath, her face brimming over with radiance of joy, her eyes moist. She is among hundreds, all draped in white, a stark remnant of traditional patriarchy that robbed them of their basic right to partake food of their choice and wear colourful clothes. They were treated as inauspicious and untouchable. A few of them were widowed when they were hardly 18 years. They were shunned by their family members who feared the women might stake their claim on property. So the widows went to Vrindavan or Varanasi, to spend the rest of their lives in the ‘service of god.’

Will a day-long celebration make any difference?

In 2012, Dr Bindeshwar Pathak of Sulabh International, learnt that bodies of widows in Vrindavan were taken away by sweepers at night, cut into pieces, put into jute bags and disposed of as government-run institutions lacked facilities for a decent funeral. This was done only after the inmates gave money to a sweeper. The widows begged on the streets. After the facts were confirmed by the National Legal Service Authority, his NGO was approached by the Supreme Court to help the destitute women — over a thousand living in four government-run shelters in Mathura. Most of them came from West Bengal, where ‘devi’ is worshipped.

When Dr Pathak came to Vrindavan to hear them out, the widows cried: “ham jeena nahi chahte (we don’t want to live).” He cried with them. His consistent efforts first focused on their mournful white robes. Slowly, the stark whiteness started giving way to coloured polka dots. “Hope has colours, too,” he had said.

Sulabh today arranges Rs 2,000 for each widow per month so that they can cook their own meal, make some agarbattis, dresses, garlands and ornaments for idols, and have a healthcare support plus a respectful burial. They also have TV sets and fridges. Festivals now evoke a simple celebration, with its essential theme: “We want to live.”

Source : http://www.tribuneindia.com/news/sunday-special/perspective/colours-they-own/376041.html

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EFE / http://www.elnuevodiario.com.ni

EL festival Holi en Vrindavan.
  •   Vrindavan, India  |   |  | Edición Impresa

Al filo del mediodía pétalos de flor y polvos de intensos colores acaban con cualquier atisbo de blanco, el color del luto en la India, en la ciudad sagrada de Vrindavan, donde cientos de mujeres indias forzadas a refugiarse tras enviudar han decidido celebrar el festival de Holi un año más.

Vrindavan, en el norte de la India, se ha convertido en la ciudad de las viudas, mujeres que tras perder a sus maridos son desahuciadas socialmente y de las que “nadie” quiere hacerse cargo en este país, según denuncia la ONG Sulabh International, especializada en atenderlas.

Esta organización celebró con decenas de ellas el tradicional festival de Holi en el histórico templo de Gopinath, una fiesta popular que tendrá lugar el próximo lunes en el resto del país con una intensa lucha con polvos de colores y que suele marcar el inicio de la primavera en el subcontinente asiático.

Las viudas indias, sin embargo, no participarán en esta celebración, en la que incluso la división de castas y sexos queda prácticamente en suspenso por un día, debido a que la norma y la costumbre social imponen su veto.

Pero las viudas cantaron, bailaron y se embadurnaron de colores al son de Holi, una celebración que el colectivo lleva a cabo en esta ciudad desde 2013.

“Celebrar Holi significa mucho para ellas, que lo han perdido todo, y les hace sentirse parte de la sociedad de nuevo”, explicó a Efe la vicepresidenta de la ONG, Vinita Verma, después de que miles de pétalos y decenas de kilos de “gulal”, como llaman a los polvos de colores, fueran lanzados en el patio del templo.

Verma lamentó la difícil situación de repudio que padecen las indias al enviudar: “Lo pierden todo y tampoco hay vida para ellas.

No pueden vestir o tocar colores, ni participar en celebraciones familiares o sociales”, dijo.

Un rechazo que contrasta con el trato dado a los viudos en la India, quienes, según cuenta Verma, suelen contar con el respaldo familiar ante la pérdida de su cónyuge.

Además de llevar a cabo este Holi inclusivo, Sulabh International atiende a diario a unas 900 mujeres en situación de viudedad, en su mayoría de entre 50 y 80 años, en siete centros ubicados en Vrindavan.

Allí, dice, suelen llegar en tren y “sin planes” desde cualquier punto de la India.

Es el caso de Rajjo Rani, que lleva una década viviendo en esta pequeña localidad del estado de Uttar Pradesh, adonde decidió irse cuando las desavenencias con su nuera hicieron la situación insostenible en la casa de su hijo.

“Estoy muy bien en la casa de acogida, estamos comiendo y viviendo bien aquí”, indicó con su rostro embadurnado de “gulal” rosa.

Junto a ella, otra viuda de 60 años y originaria de Calcuta, cuenta que vive en Vrindavan desde hace un cuarto de siglo, tras sufrir la pérdida de su esposo con tan solo 17 años.

“Estoy muy contenta aquí”, dijo.

En los centros de acogida gestionados por Sulabh International reciben ropa, comida diaria, medicinas y dinero de bolsillo, explicaron ambas mujeres.

La directiva de la organización describe el trato que India brinda a sus viudas como “cruel”.

“No hay libro sagrado del hinduísmo que diga que ellas no pueden participar en las celebraciones, tocar los colores o comer buena comida, es una costumbre creada por la sociedad y estamos tratando de romperla”, aseguró Verma.

El próximo lunes se celebrará oficialmente el festival de Holi y millones de personas jugarán a lanzarse agua y polvos de colores en las calles de la India para rendir culto al dios Vishnú y su avatar Krishna.

El festival del color, como es conocido en el país asiático, se celebra oficialmente la primera luna llena de marzo y sus orígenes se remontan a diferentes leyendas mitológicas hindúes.

Source : http://www.elnuevodiario.com.ni/especiales/421373-luto-colores-ciudad-viudas/

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Daily News and Analysis

Date published: Friday, 10 March 2017 – 1:58pm | Author: DNA Web Team | Agency: DNA webdesk

Celebrating Holi

A widow dances during celebrations for Holi or “festival of colours” in Vrindavan, Uttar Pradesh on March 9. ​Image courtesy: AFP

Shunning age-old taboo, widows from Varanasi and Vrindavan played Holi on the premises of the 400-year-old Gopinath Temple on Thursday.

Clad in white saree, a large number of widows gathered at one of the oldest Krishna temples in the crowded Gopinath Bazaar in Vrindavan braving the morning chill and splashed colours on each other.

Vrindavan

Widows celebrate Holi in Vrindavan ​Image courtesy: AFP

A large numbers of widows from Varanasi also participated in the event organised by social activist Bindeshwar Pathak, the founder of NGO Sulabh International.

Holi in Vrindavan

Widows congregated on a small patio of the Gopinath temple in which they live and danced and played with coloured powder to celebrate the occasion. Image courtesy: Reuters

“Their participation in Holi symbolises a break from tradition which forbids a widow from wearing coloured saree, among many other things,” Pathak said.

Gopinath Temple

One of the widows dances during Holi celebrations at ancient Gopinath Temple in Vrindavan on Thursday. Image courtesy: PTI

1,500 kg ‘gulal’ (coloured powder) and 1,500 kg of petals were arranged for the event, the NGO said in a press release.

Gopinath Temple

A widow dances in front of the pictures of Lord Krishna and Radha as she celebrates Holi at the ancient Gopinath Temple in Vrindavan on Thursday Image courtesy: PTI

The NGO has been paying Rs 2,000 to 800 widows living in eight Ashrams in Vrindavan and Varanasi for the last five years, the release added.

Vrindavan's

Widows playing Holi with flowers at Gopinath temple in Vrindavan on Thursday. Image courtesy: PTI

Phool ki Holi

Widows take part in Holi celebrations in the town of Vrindavan in the northern state of Uttar Pradesh. Image courtesy: Reuters

Festival of Colours

Indian widows celebrate Holi in Vrindavan. Image courtesy: Reuters

Source : http://www.dnaindia.com/india/photo-gallery-widows-break-away-from-age-old-taboo-and-celebrate-holi-in-vrindavan-2348710