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दो वर्ष पहले उत्तराखंड की त्रादसी सैकड़ों माताओं और बहनों को विधवा बना दिया। सरकार क्या की यह सभी जानते हैं परन्तु एक व्यक्ति डॉ बिन्देश्वर पाठक ने क्या किया, यह गवाह है उन विधवा महिलाओं के चेहरों पर खुसी और उनकी हंसी। यहाँ की ही विधवाओं को नहीं बल्कि बनारस और वृन्दावन की विधवाओं के लिए भी डॉ पाठक एक ‘ईश्वर’ के सामान ही हैं।
क्या आपको पता है भारत की कुल १३० करोड़ आवादी का साढ़े-तीन फीसदी विधवाएं जो कभी बेटी थी, फिर पत्नी बनी, फिर बहु बनी, फिर सास बनी, फिर दादी-नानी बनी, और जैसे ही विधवा बनी – संतान उठाकर विधवा आश्रमों में फेक देता/देती है – जैसे हम इस्तेमाल नहीं होने वाली वस्तुओं को कूड़ेदान में फेंक देते हैं। कितना मार्मिक है , कितना अमानुषिक है, कितना कष्ट प्रद है न, लेकिन सच है। कैसा कलेजा है उन संतानों का जो बुढापे में अपनी माँ का सहारा बनने के बजाय विधवा आश्रमों में छोड़ आते हैं जहाँ न तो वस्त्र है, न ही खाना, न ही दवा और न ही संतानों का सुख – गजब.

 

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