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बिंदेश्वर पाठक सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक हैं.  

यह खुशी की बात है कि भारत में इस बात को लेकर जागरूकता आई है कि यहां 12,30,00,000 घरों में शौचालय नहीं हैं और 80,00,00,000 की आबादी खुले में शौच करती है. इसे लेकर सरकार भी गंभीर है. वैसे तो किसी व्यक्ति का किसी दूसरे का शौच साफ करना कानूनन निषिद्ध है. लेकिन देश के कई भागों में कुछ लोग, खासकर महिलाएं, आज भी अपने हाथों से दूसरों का मैला साफ करती हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कथन 'देवालय से पूर्व शौचालय' और बाद में 15 अगस्त के उनके भाषण में संपूर्ण स्वच्छता कार्यक्रम के तहत अगले एक वर्ष में सभी स्कूलों में शौचालय तथा 2019 तक खुले में शौच को खत्म करने की घोषणा ने देश में जोश भर दिया है. मैं बेहद खुश हूं कि आखिर हमारा नेतृत्व करने वालों को आभास हो गया कि गंदगी से मुक्ति के बगैर भारत महान राष्ट्र नहीं बन सकता.



स्वच्छता के बिना व्यक्ति सम्मान और बेहतर स्वास्थ्य हासिल नहीं कर सकता. इसी दृष्टि से 1970 में मैंने सुलभ आरंभ किया था. यह धीरे-धीरे आंदोलन में बदल गया और दुनिया में स्वच्छता का काम करने वाले गैर-सरकारी संस्थानों में सबसे बड़ा है. इसमें 60,000 स्वैच्छिक कार्यकर्ता हैं. हमारा आंदोलन दो प्रमुख उद्देश्यों पर केंद्रित है: स्वच्छता के लागत-प्रभावी उपायों के जरिए पर्यावरण और जल प्रदूषण को रोकना तथा मानव-मल की सफाई में लगे अस्पृश्य कहे जानेवाले लोगों की मुक्ति और पुनर्वास. अभी तक हमने 12,00,000 घरेलू और 8,500 सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण किया है. 10,000 से अधिक स्कैवेंजरों को मुक्त करवाया है. 



वैसे आज भी प्रदूषण का स्तर बेहद ज्यादा है और मानव-मल की सफाई करने वालों की संख्या भी बड़ी है. हमारे बहुआयामी आंदोलन ने दिखाया है कि इसका निदान कैसे होगा. मैं समाज सुधार के इस क्षेत्र में कैसे आया, यह मेरे बचपन की कुछ घटनाओं से जाना जा सकता है. मेरा जन्म 1943 में बिहार के वैशाली जिले के एक गांव में एक रूढि़वादी ब्राह्णण परिवार में हुआ. जब मैं 6 वर्ष का था तो मैंने एक कथित अस्पृश्य महिला को छू दिया और रूढि़वादी अस्पृश्यता को मानने वाली मेरी दादी ने शुद्ध करने की बात कहकर जबरन मुझे गाय का गोबर और गौ मूत्र पिलाया. उसका कड़वा स्वाद आज भी मेरे मुंह में है. 



मैं एक बड़े घर में पला-बढ़ा, जिसमें 9 कमरे थे, पर एक भी शौचालय नहीं था. मैं सोते हुए या अद्र्धनिद्रा में हर सुबह कुछ आवाजें सुनता था. कोई बाल्टी उठा रहा था, कोई पानी भर रहा था और महिलाएं सूर्योदय से पहले शौच के लिए बाहर जा रही होती थीं. कोई महिला बीमार पड़ जाती तो उसे एक मिट्टी के बर्तन में ही शौच करना पड़ता था. कई महिलाओं के सिर में दर्द रहता क्योंकि उन्हें दिनभर अपने शौच को रोककर रखना पड़ता था. मैंने यह सब देखा है. मैंने उन पुरुषों की झुकी हुई नजरें भी देखी हैं, जो दिन के समय खुले में शौच के लिए बैठे होते थे. 



मुझे बाद में समझ आया, यही कहानी भारत के 7,00,000 गांवों और सैकड़ों शहरों की है. मेरी शिक्षा चार स्कूलों में हुई. उनमें से किसी में भी शौचालय नहीं था. पटना विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में स्नातक करके मुझे 1968-69 में बिहार गांधी जन्म शताब्दी समारोह समिति के भंगी मुक्ति विभाग में काम करने का मौका मिला. समिति ने मुझे सुरक्षित और सस्ती शौचालय तकनीक विकसित करने और दलितों के सम्मान के लिए काम करने को कहा ताकि उन्हें मुख्य धारा में शामिल किया जाए. एक उच्च जाति के एक पढ़े-लिखे युवक के लिए यह एक गलत कदम माना जाता था. लेकिन इसने मेरे व्यक्तित्व में बड़ा बदलाव किया और मेरे जीवन का रुख ही मोड़ दिया.



मेरे जीवन में नया मोड़ तब आया, जब मैं बेतिया की दलित बस्ती में तीन महीने के लिए उनके बीच रहने गया. उस समय देश में जाति-प्रथा चरम पर थी. उनके साथ रहते हुए मैंने कई चीजें देखीं, जिन्होंने मेरी आंखें खोल दीं. इस वर्ग की पीड़ा दर्दनाक थी. तब मैंने अपना जीवन स्कैवेंजरों के लिए समर्पित करने की ठान ली. मैंने उस अपमान और तानों को नजरअंदाज किया जो मुझ पर आ रहे थे. अब मेरे सामने सवाल था पश्चिमी देशों में इस्तेमाल हो रही महंगी कलश और सीवर व्यवस्था के विकल्प के रूप में प्रभावी और सस्ती शौचालय व्यवस्था का विकास कैसे किया जाए, ताकि स्कैवेंजिंग प्रथा रोकी जा सके और उन्हें किसी अन्य काम में पुनर्वासित किया जा सके.

मैं कोई इंजीनियर या वैज्ञानिक नहीं था. इस वजह से शौचालय-प्रणाली का आविष्कार करने के लिए उपयुक्त नहीं था. लेकिन मैंने अपने दिमाग का इस्तेमाल किया, गहन शोध किया और इस विषय पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की किताब की मदद से 1968 में एक टू-पिट पोर-कलश, डिस्पोजल कंपोस्ट शौचालय का आविष्कार किया, जो सरलतापूर्वक स्थानीय वस्तुओं से, कम लागत पर बनाया जा सकता. यह आगे चलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानव-अपशिष्ट के निपटान के लिए बेहतरीन वैश्विक तकनीकों में से एक माना गया. पहली बार इसकी सार्थकता दिखाने के लिए मुझे लंबा संघर्ष करना पड़ा. 1973 में मुझे यह अवसर मिला. 

शौचालय का प्रयोग सफल हुआ और इसने लोगों का ध्यान आकर्षित किया. इससे प्रोत्साहित होकर मैंने 1974 में शहरी क्षेत्रों में 'भुगतान और उपयोग' के आधार पर सामुदायिक शौचालयों की अवधारणा विकसित की. इसे सबसे पहले बिहार और फिर पूरे भारत में लोकप्रियता मिली. धीरे-धीरे मैंने इस व्यावहारिक नीति का विकास किया कि एक गैर-सरकारी संगठन सरकार, स्थानीय निकायों, नागरिकों और लाभार्थियों के मध्य किस प्रकार एक उत्प्रेरक के तौर पर काम कर सकता है. इस रास्ते को अपनाकर सुलभ ने सरकारी, गैर-सरकारी संगठन की साझेदारी का सफल उदाहरण दिया.

स्वच्छता के साथ ही हमने दलित बच्चों की शिक्षा के लिए पटना, दिल्ली और अन्य जगहों पर स्कूल खोले जिससे स्कैवेंजिंग और निरक्षरता के उन्मूलन में सहायता मिली. महिलाओं और बच्चों को आर्थिक अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से हमने व्यावसायिक प्रशिक्षण-केंद्रों की स्थापना की है. कई सांस्कृतिक पहल की: हमने जाति-बंधन को तोडऩे के उद्देश्य से स्कैवेंजरों को मंदिरों में ले जाने, उच्च वर्गों और स्कैवेंजरों का एक दूसरे के घर में आने-जाने, अंतरजातीय सम्मेलन और गोष्ठियां आयोजित कीं. इससे जातिवादी मानसिकता में बदलाव आया, सामाजिक बंधन शिथिल हुए और जाति-प्रथा को तोडऩे की प्रक्रिया शुरू हुई.

हमने राजस्थान के अलवर में भी व्यावसायिक प्रशिक्षण-केंद्र की स्थापना की है. यहां दलित महिलाओं को सिलाई, कढ़ाई और ब्यूटी केयर में प्रशिक्षण दिया जाता है, जो पहले सिर पर मैला ढोने का काम करती थीं. 2008 में प्रशिक्षण पाने वाली करीब तीन दर्जन महिलाओं को हम न्यूयॉर्क ले गए, ताकि वे संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में फैशन शो में शिरकत कर इंटरनेशनल इयर ऑफ सैनिटेशन में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकें. इसके बाद सुलभ ने बायोगैस, जैव-उर्वरक, द्रव और कचरा-प्रबंधन, गरीबी-उन्मूलन के काम में पदार्पण किया. हमने सुलभ इंटरनेशनल सेंटर फॉर ऐक्शन सोशियोलॉजी, सुलभ इंटरनेशनल एकेडमी ऑफ एन्वायर्नमेंटल सैनिटेशन और दिल्ली में एक अनोखे संग्रहालय म्युजियम ऑफ ट्वॉयलेट्स की स्थापना की. यह प्राचीनकाल की शौचालयों की विकास की कहानी बताता है. बहरहाल, सुलभ ने देश में जो भी योगदान दिए हैं, वह शौचालयों की संख्या में खो जाते हैं, लेकिन हमारा लक्ष्य सिर्फ शौचालय ही नहीं बल्कि सामाजिक बदलाव तथा मानवीय विकास है.  

2019 तक खुले में शौच की परंपरा खत्म करना संभव है, लेकिन चुनौतियां अधिक हैं. सिर्फ राज्य और कॉर्पोरेट घरानों के तालमेल से यह मुमकिन नहीं होगा, जैसा कि प्रधानमंत्री ने संकेत दिया है. इसमें जीवंत लोगों की भागीदारी और सुनियोजित योजनाओं की भी जरूरत है. यदि स्वच्छता को राष्ट्रीय प्रयोजन के तौर पर अपनाने की राजनैतिक इच्छाशक्ति हो और जरूरी पूंजी का इंतजाम हो तथा 50,000 प्रशिक्षित प्रेरकों के साथ मिलकर एक प्रभावी आंदोलन किया जाए तो देश के हर घर में शौचालय उपलब्ध होगा. और तब हम 2019 तक खुले में शौच को अलविदा कह सकेंगे.