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महिला सुरक्षा पिछले कुछ अरसे से देश की चिंताओं की प्राथमिकता सूची में काफी महत्वपूर्ण स्थान पाने लगी है। ये और बात है कि महिला विमर्श बढ़ने के बावजूद महिलाओं की स्थिति में कोई उल्लेखनीय सुधार नहींहुआ है। और यह सुधार तब तक नहींहो सकता, जब तक समाज की सोच में बदलाव नहींआएगा। सदियों से चली आ रही मानसिकता को एकदम से नहींबदला जा सकता। शिक्षा, राजनीति, धर्म, उद्योग, व्यापार, मनोरंजन सभी क्षेत्रों में नयी परिपाटी डालने की आवश्यकता है, तब किसी सुधार की उम्मीद की जा सकती है। पहले के मुकाबले स्थिति बदली जरूर है, पर पुरुषों के एकदम बराबर स्थान अब भी महिलाओं को नहींमिला है। छेड़खानी, बलात्कार, दहेज जैसे घृणित अपराध इसलिए अब भी जारी हैं। दिल्ली के निर्भया प्रकरण के बाद महिलाओं को आत्मरक्षा के गुर सिखाने में तेजी दिखाई गई। मार्शल आर्ट के दांव-पेंच सीखने के साथ, मिर्ची स्प्रे रखने का चलन भी बढ़ा। अब कानपुर की फील्ड गन फैक्ट्री ने महिलाओं के लिए खास हल्की रिवाल्वर बनायी है, जिसे आसानी से पर्स में रखा जा सकता है, और उसकी मारक क्षमता सामान्य रिवाल्वर की तरह ही है। इसे नाम दिया गया है निर्भीक। कुछ नारीवादियों का यह तर्क हो सकता है कि महिलाआेंके लिए बनाए गए हथियार का नाम पुल्लिंग क्यों रखा गया? निर्भीक की जगह निर्भया नाम रखने में क्या हर्ज था? मिर्जा गालिब की तर्ज पर कहें तो जोर से गोली चले तो उसे निर्भीक कहें और हल्के से चले तो निर्भया। बहरहाल, निर्भीक नामक पिस्तौल धारण करने से महिलाएं क्या सचमुच निर्भीक हो जाएंगी, इस सवाल का जवाब मिलना अभी बाकी है। हो सकता है इससे हथियार बनाने वालों को आरंभिक फायदा हो। पर यह भी सोचने वाली बात होगी कि कहींइस तरह हथियारों को बढ़ावा देने से हमारे देश में अमरीका की तरह हथियार संस्कृति न बढ़ने लगे। उसके कैसे-कैसे नुकसान हुए हैं, यह पिछले कई वर्षों से दुनिया देखती आ रही है। बंदूक या मिर्च स्प्रे जैसी बाहरी ताकत महिलाओं को उपलब्ध कराने से बेहतर है, उनकी भीतरी ताकत को इज्जत  देना और इस तरह उनमें नया आत्मविश्वास जगाना। 

साधारण भारतीय महिलाएं अपने दम पर जितने विविध कार्यों को संपन्न करती हैं, वह अचंभित करता है। उनके ऐसे ही रूप को देखकर शायद नौ हाथों वाली देवी की कल्पना की गई है। फिर भी उनकी बहुमुखी प्रतिभा को हाशिए पर रखा जाता है। इतना ही नहींमखौल उड़ाना हो या अपशब्द कहना हो, उसमें भी महिलाओं को ही निशाने पर रखा जाता है। उनके आत्मसम्मान को चोट पहुंचाने का कोई मौक नहींछोड़ा जाता। जब भीतर से कमजोर करने की परंपरा बनी हो, तब बाहरी शक्ति से किस चमत्कार की अपेक्षा रखी जाए। यह महिलाओं की ही शक्ति है कि पुरुष प्रधान सोच वाले समाज में जब-तब अपने कार्यों से, हौसलों से इतिहास गढ़ लिया करती हैं। ऐसा ही एक इतिहास लिखा है मध्यप्रदेश के देवास जिले के गांव मुंडलना की एक दलित महिला ने। सविता नाम की इस महिला ने अपने पति के घर शौचालय बनवाने के लिए दबाव डाला। खुले में शौच से इन्कार किया और अपने विवाह को खतरे में डालकर पिता के घर चली आयी। दैनिक मजदूरी करने वाली इस महिला की दृढ़ इच्छाशक्ति ने उसके पति को घर में शौचालय बनवाने पर मजबूर किया। स्वयंसेवी संस्था सुलभ इंटरनेशनल ने इस दलित महिला को 2 लाख रुपयों से पुरस्कृत किया है। मध्यप्रदेश सरकार और केंद्र सरकार ने इस हिम्मती महिला को सम्मानित करने के बारे में क्या विचार किया है, यह अभी पता नहीं। लेकिन अगर सरकारें ऐसी महिलाओं को हौसला बढ़ाएंगी तभी निर्मल भारत जैसे अभियान सार्थक और सफल होंगे।

Source : http://www.deshbandhu.co.in/newsdetail/1701/6/0