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सुलभ एक बहुत ही खुशनुमा अहसास है. एक माधवी गजल है। सरगमी गुनगुनाहट है। सुलभ एक ताजगी का नाम है। सुलभ, शौचालय का प्रकार और प्रकल्प ही नहीं, वल्कि एक विशिष्ट प्रक्रिया की निष्पत्ति है। सुलभ में मल तो एक स्थूल अभिव्यक्ति है। इसकी दार्शनिक अभिव्यक्ति तो मलमली अहसास की ही है। मल की बुनियाद पर यहाँ माल है,माला है और सब मालामाल हैं। ना जाने कितनी बजबजाती जिंदगी और जमात सुलभ की खुशबू से महक रही है. दमक रही है। सुलभ में आप नहीं भी आये हैं तो भी सुलभ नाम आपको मुस्कराहट देता है.तरंगित और तरोताजा करता है।

शौच-निवृत्ति के मार्ग प्रशस्त करने की प्रतिबद्धता ने डॉ बिंदेश्वर पाठक को टॉयलेट-मैन के रूप में प्रख्यात बना दिया। माउंटेन-मैन से भी बड़ी पहाड़ जैसी डॉ बिंदेश्वर पाठक की पहल आज सबको प्ररित करती है। संतप्त और अभिशप्त जिंदगी को डॉ पाठक अपनी सहज और बोधगम्य अभिव्यक्ति के माध्यम से मन को भी निर्मल करने में लगे हैं। इनका स्वच्छता अभियान सोच और शौच से जोड़ता है।

पाठक के पास स्मित है, मुस्कराहट है, हंसी है, ठिठोली है, ठहाका है, अट्टहास है और आंसू हैं। आप जानते हैं कि खुशियों के भाव को स्मित कहते हैं। इस ‘स्मित’ को जब ओठों का बल मिलता है तो मुस्कराहट का जन्म होता है। मुस्कराहट को ‘कंठ’ जब सहयोग करता है तो हंसी जन्म लेती है।अंग- प्रत्यंग जब झंकृत हो तो ठिठोली जैसा रस पैदा होता है. नाद जब निनाद करे तो अट्टहास का जन्म होता है। कुंडलनी जब जाग्रत हो जाय तो वह अट्हास आंसू में तब्दील हो जाता है।

आंसू ही जीवन का अंतिम सत्य है। सुलभ में किसी ‘डिजीज का पेन’ नहीं, वल्कि ‘डिलीवरी का ही पेन’ दिखता है। डॉ पाठक के महावीर इन्क्लेव की इस डिस्पेंसरी में हर पल खुशियां प्रसूत होती रहती हैं। जीवन की किलकारियां यहाँ गूंजती ही रहती हैं। यहाँ प्रेम है नृत्य है गीत और संगीत है। यहाँ आकर जीवन एक उत्सव में तब्दील हो जाता है। जिनको सुलभ-रोग लग जाय उसे प्रेम-रोग हल्का लगता है। यहाँ जीवन का सत्य सबके लिए सुलभ है और इसीलिये यहाँ शिव है और सौन्दर्य भी है।

पाठक का प्रेम-साम्राज्य  निरंतर विस्तार ले रहा है। दूर-दूर तक कोई चुनौती नहीं है। समभाव,   साक्षीभाव और स्थितप्रज्ञता इन्हें विदेह बनाता है। राहुल और यशोधरा के बीच भी डॉ पाठक के निर्वाण की निर्विकल्प-समाधी जारी है। पाठक रो तो सकते हैं पर किसी को रुला नहीं सकते। इसे आप मौद्रिक बकाया और भुगतान के सन्दर्भ में ना देखें तो अच्छा है। इस भुगतान संतुलन पर उनका जीवन-संतुलन नहीं टिका है बुद्ध होने के लिए सिद्धार्थ होना एक आंशिक सच है। पर पाठक का प्रारब्ध तो कुछ और ही था. मां जो जीवन की प्रथम पाठशाला है। इस पाठशाला की पाठ ने पाठक को पाठक बनाया है।उस तरह की पाठशाला आज की भी एक जरूरी जरुरत है।

— बाबा विजयेन्द्र की कलम से 

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