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प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी ने 2 अक्‍टूबर को 'क्लीन इंडिया मूवमेंट' यानी 'स्‍वच्‍छता अभियान जनांदोलन' की शुरुआत की थी, लेकिन 'सुलभ इंटरनेशनल' देश की एक ऐसी संस्‍था है जो पिछले कई दशकों से इस अभियान के जरिए लोगों के जीवन में परिवर्तन की वाहक बनी हुई है। 'देवालय से पहले शौचालय' की उद्घोषणा करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को गंदगी से मुक्त करने और हर नागरिक को शौचालय उपलब्ध कराने के लिए करीब 60 हजार करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया है। देश के अधिकांश गांवों में आज भी शौचालय नहीं होने के कारण महिलाओं को खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है। बेहद गरीबी से देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे नरेंद्र मोदी और उनके परिवार ने भी दशकों खुले में शौच की तकलीफ झेली है, इसलिए वह 'स्‍वच्‍छता और शौचालय' के महत्‍व को समझते हैं!

भारत में 70-80 के दशक में सुलभ इंटरनेशनल ने गांव-गांव शौचालय का निर्माण कर सबसे पहले खुले में शौच के राष्‍ट्रीय शर्म से देश को मुक्‍त करने का प्रयास किया था, जो आज भी जारी है। हरियाणा के अति पिछड़ा जिला मेवात के किसी गांव में आज भी शत-प्रतिशत शौचालय नहीं है, लेकिन सुलभ ने इसी जिला के हिरमथला गांव में शत-प्रतिशत शौचालय का निर्माण करा, गांव को खुले में शौच के शर्म से पूरी तरह से मुक्‍त कर दिया है। इस गांव को राष्‍ट्रपति द्वारा 'निर्मल ग्राम' का पुरस्‍कार भी मिला है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लक्ष्‍य को समझने और सुलभ इंटरनेशनल के कार्य को देखने व अध्‍ययन करने के लिए मैं मेवात के हिर मथला गांव गया। मेरे साथ रेडियो फ्रेंच इंटरनेशनल के फ्रेंच पत्रकार सबस्‍टीन फ्रेसिका भी थे, जिसकी नजर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हर घर शौचालय की घोषणा शायद इतनी जल्‍दी फलीभूत न हो सके। लेकिन वह भारत के गांवों को नजदीक से देखना चाहते थे कि बिना शौचालय के लोग रहते कैसे हैं और फिर शौचालय बनने के बाद उनके जीवन में परितर्वन कैसे घटित होता है।

गांव में मैं 50 वर्षीय महिला गीता से मिला। गीता कहती है, '' हमारे घर शौचालय नहीं था तो हम महिलाओं को रोज सुबह 4 से 4.30 बजे उठकर घर से दो से तीन किलोमीटर दूर शौच के लिए जाना पड़ता था। उस अंधेरे में सुरक्षा का भय हमेशा लगा रहता था, इसलिए महिलाएं समूह बनाकर जाती थीं।  सुबह के बाद हमें शौच के लिए फिर रात का ही इंतजार करना पड़ता था। दिन में शौच आने के बावजूद हम नहीं जा सकती थीं। इसकी वजह से इस गांव की अधिकांश महिलाएं अक्‍सर गैस्ट्रिक, कब्‍ज, पेट के अल्‍सर की शिकार ही रहती थीं। पूरा जीवन दवा पर ही चल रहा था, लेकिन जब से सुलभ के सहयोग से शौचालय बना, हमारे शरीर में व्‍याप्‍त सारी बीमारियां दूर हो गई। यह तो शौचालय बनने के बाद धीरे-धीरे समझ में आया कि हमारी बीमारियों की असली वजह शौच था, जिसे दिन भर पेट में रोके रखना हमारे लिए मजबूरी थी।

एक अन्‍य महिला कलिया देवी भी बुजुर्ग हैं। उन्‍होंने बताया कि कुछ वर्ष पहले ही एक आठ वर्ष की बच्‍ची को दिन में शौच लगी थी। वह शौच के लिए सड़क किनारे स्थित खुले मैदान में गई थी कि रास्‍ते से गुजर रहे एक मोटराइकिल सवार ने गाड़ी रोकर उसे उठा लिया और उसका हाथ बांध कर मोटरसाइकिल पर बैठा लिया। रास्‍ते में उस बच्‍ची को अपने गांव का एक पुरुष आता दिखा और वह मोटरसाइकिल से कूद गई। गांव वाले इकटठे हो गए, जिसके कारण वह बच गई। ऐसी घटनाएं पहले अक्‍सर होती थी, क्‍योंकि शौचालय का अभाव महिलाओं व बच्चियों की जिंदगी को नर्क बनाए हुए था।

गर्भवती महिलाओं की जिंदगी तो और भी नर्क थी। गर्भ के समय शौच न होने की समस्‍याओं से जूझने के कारण अपने जीवन को संकट में डालने वाली इसी गांव की एक महिला विजय लक्ष्‍मी बताती हैं कि जब वह गर्भवती थी तो एक बार दिन के समय उसे शौच आया, लेकिन शौचालय नहीं होने के कारण वह नहीं जा सकी। उसे घर से 3 से 4 किलोमीटर दूर खेत में शौच के लिए जाना पड़ता था। समय पर शौच नहीं आने के कारण फिर उसे कब्‍ज की बीमारी हो गई और 8-9 दिन तक उसे शौच ही नहीं आया। पेट में इतना तेज दर्द उठा कि उसे 9 दिन बाद अस्‍पताल में ले जाया गया। उनका जब बेटा पैदा हुआ तो उसका सिर बड़ा और हाथ-पैर पतला था। बाद में डॉक्‍टर ने बताया कि कई दिनों तक शौच रोके रखने के कारण ही वह ऐसा पैदा हुआ था।

विजय लक्ष्‍मी कहती है, दूसरी बार जब मैं गर्भवती हुई तो उस वर्ष बारिश बहुत हुई थी। पूरा गांव बारिश के पानी में डूब गया था। शौच के लिए घर से बाहर जाना मुश्किल था। पानी को तैर कर शौच के लिए जाना पड़ता था। जब पानी कम था तो मोटरसाइकिल पर बैठाकर मेरे पति खेत में शौच कराने ले जाते थे, जहां खेत के मेड़ पर बैठकर शौच करना पड़ता था। लेकिन जब पानी कमर से ऊपर तक आ गया तो मोटरसाइकिल वहां तक जा ही नहीं सकता था। चारदीवारी, मकान की दीवार आदि पर बैठकर शौच करना पड़ता था, जो एक महिला के नाते बहुत मुश्किल होता था। उसके बाद ही मेरे मायके वालों ने दबाव डाला कि घर में शौचालय बनवाओ। मेरे मायके में शौचालय पहले से था। मायके वालों के कहने पर पति ने शौचालय बनवाने का निर्णय लिया।

घर में मोटरसाइकिल होने और शौचालय नहीं होने के सवाल पर विजय लक्ष्‍मी ने कहा, दरअसल समस्‍या पैसे की नहीं थी, समस्‍या यहां के लोगों के मानसिकता की थी। पुरुषों को तो कोई दिक्‍कत नहीं थी। वे तो कभी भी शौच के लिए घर से बाहर जा सकते थे और महिलाओं के लिए शौचालय का निर्माण उन्‍हें पैसा जमीन में गाड़ने जैसा लगता था, जिसके कारण शौचालय का निर्माण कोई नहीं कराता था। यह तो सुलभ की टीम ने लोगों को समझाया कि शौचालय न केवल महिलाओं के लिए, बल्कि सभ्‍य समाज के लिए कितना जरूरी है।

सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन की उपाध्‍यक्ष और हिरमथला गांव की प्रमुख प्रभारी मोनिका जैन बताती हैं, इस गांव में शुरू में शौचालय निर्माण के नाम से ही लोगों को आपत्ति थी। इसलिए हमने प्रोजेक्‍ट के तौर पर शुरू में केवल चार घरों में ही शौचालय का निर्माण कराया, लेकिन यह क्रांतिकारी कदम साबित हुआ। उस घर की महिलाओं को शौच के लिए बाहर न जाता देख, दूसरे घर की महिलाओं ने भी अपने यहां शौचालय बनवाने का दबाव घर के पुरुषों पर डाला और आज मेवात जिले का यह एक मात्र गांव है, जहां शत-प्रतिशत घरों में शौचालय है।

मोनिका जैन कहती हैं, शौचालय का निर्माण होने के कारण न केवल सड़क किनारे और गांव के आसपास की साफ-सफाई हुई, बल्कि महिलाओं की सुरक्षा का मसला भी सुलझ गया। सबसे बड़ी बात यह कि शौचालय नहीं होने के कारण गांव के लोगों के स्‍वास्‍थ्‍य में भी सुधार आया। पहले इस गांव के बच्‍चों व महिलाओं में टायफायड, उल्‍टी-दस्‍त, कब्‍ज, पेट के अल्‍सर की जबरदस्‍त समस्‍याएं थीं। आज भी इस गांव के आसपास के गांवों में इन बीमारियों की समस्‍या जस की तस बनी हुई है, लेकिन शौचालय निर्माण के कारण हिर पथला गांव के बच्‍चों और महिलाओं की सेहत में सुधार आया है।

सुलभ के स्‍थानीय कार्यकर्ता नसीम के अनुसार, इस गांव में एक भी प्राथमिक चिकित्‍सा केंद्र नहीं है। यहां के लोगों को इलाज के लिए कई किलोमीटर दूर घासेड़ा गांधिग्राम जाना पड़ता है। यहां पढ़ाई के लिए केवल 8वीं तक ही स्‍कूल है। वहां शौचालय तो है, लेकिन उसकी हालत उतनी अच्‍छी नहीं है। यही नहीं, लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय की व्‍यवस्‍था भी नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हर घर में शौचालय निर्माण का जो लक्ष्‍य रखा है, वह बेहद अहम है।

हिरमथला गांव की जनसंख्‍या करीब 1500 है। इस गांव में 60 फीसदी मुस्लिम और 40 प्रतिशत हिंदू आबादी रहती है। गांव के सरपंच ममदीन एक मुस्लिम हैं, लेकिन प्रोजेक्‍ट के रूप में सबसे पहले शौचालय का निर्माण उन्‍होंने अपने ही घर में कराया, जिससे हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदाय के लोगों को प्रेरणा मिली। सरपंच ममदीन के भतीजे की पत्‍नी शमीना कहती हैं, शौचालय के निर्माण ने हम सभी के जीवन में सकारात्‍मक बदलाव किया, खासकर हम महिलाओं के। इस गांव के हर व्‍यक्ति के पास मोबाइल तो था, लेकिन घरों में शौचालय नहीं। सुलभ इंटरनेशनल ने इस मानसिकता को बदलने में हमारी मदद की।

सुलभ की हिरमथला गांव की प्रमुख प्रभारी मोनिका जैन कहती हैं, 2011 में सुलभ ने इस गांव के हर घर में शौचालय निर्माण का प्रोजेक्‍ट शुरू किया था और केवल छह महीने में ही उसे पूरा कर दिया। इस प्रोजेक्‍ट को सुलभ, सरकारी पीएसयू रेलटेल और स्‍वयं गांव के लोगों ने मिलकर पूरा किया है। जनवरी 2012 में इसे निर्मल ग्राम का पुरस्‍कार भी मिला। हम चाहते हैं कि इस गांव को देखकर आसपास के अन्‍य गांवों में भी शौचालय निर्माण को लेकर लोग जागरूक हों ताकि आजादी के इतने वर्ष बाद भी शौचलय नहीं होने के शर्म से हमें निजात मिले। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब से स्‍वच्‍छता अभियान और शौचालय निर्माण के प्रति लोगों से जुड़ने का आहवान किया है तब से लोगों में भी जागरूकता आई है। हमारी अगली कोशिश ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों को इस बारे में जागरूक करना और उन्‍हें स्‍वच्‍छ भारत अभियान के लिए प्रेरित व प्रशिक्षित करना है।

Source : http://aadhiabadi.com/positive-interference/initiative/1044-some-beautiful-story-of-my-clean-india-campaign-1