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ग्यारह वर्ष पहले उषा चौमर अलवर में मैला ढोया करती थी आज वे कईं राष्ट्रीय और अंर्तराष्ट्रीय मंचों पर छूआछूत के खिलाफ़ और महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दों को उठा रही हैं। 2003 में सुलभ अंर्तराष्ट्रीय सामाजिक सेवा संगठन ने उन्हे मैला ढोने की अमानवीय प्रथा से मुक्ति दिलाई थी और आज वो इसी संगठन की अध्यक्ष हैं। लेकिन शायद इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण यह कि एक राजपूत महिला शीला जिनके घर का वे मैला ढोती थी, आज वे पहले की तरह उषा के साथ छूआछूत करने की बजाय उसके साथ उठने बैठने और खान पान करने में कतई परहेज़ नही करती और इससे भी ज़्यादा उषा के साथ छूआछूत के खिलाफ अभियान में हिस्सा भी ले रहीं है। शीला का मानना है उषा के उदाहरण ने उनको सोच बदलने पर मजबूर किया है। हाल ही में ब्रिटिश एसोसिएशन ऑफ साउथ एशियन स्टडीज़ के वार्षिक सम्मेलन को संबोधित कर लौटी उषा का कहना है कि वे चाहती है कि भारत समेत पूरे विश्व में जाति और रंग भेदभाव के नाम पर छूआछूत समाप्त हो और मैला ढोने जैसी अमानवीय प्रथा पूरी तरह से समाप्त हो जाए। संबोधन में अपने जीवन के कटु अनुभवों को बयान करते हुए कहा कि दलितों के लिये अभी बहुत किया जाना बाकी है।

‘‘यह सही है कि अब हम अछूत नही लेकिन जहां तक दलितों का सवाल है उनके पुर्नवास के लिये बदलाव लाना होगा ।

2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार हमारे देश में अब भी सात लाख चौरानवे हज़ार से ज्यादा लोगों द्वारा मैला ढोने का काम किया जा रहा है। मैला ढोने का काम करने वाले लोग और उनके परिवार सबसे ज़्यादा छूआछूत का शिकार हैं।

छूआछूत को समाप्त करने का प्रावधान हमारे संविधान में ही शामिल कर दिया गया था और छूआछूत एक दंडनीय अपराध है। लेकिन आज भी हमारे देश में जाति के नाम पर छूआछूत जारी है। नेशनल कांउसल ऑफ अपलाइड इकोनॉमिक रिसर्च द्वारा 2011-2012 में कराये गये ‘भारत मानव विकास सर्वेक्षण‘ के अनुसार चार में से एक भारतीय ने किसी ना किसी तरह की अस्पृष्यता या छूआछूत करने की बात को स्वीकार किया। बहुत सारे गांवो में आज भी लोग जाति के अनुसार बसाई गई बस्तियों में रहते हैं।

सुलभ अंर्तराष्ट्रीय सामाजिक सेवा संगठन ने सुलभ शौचालय खोल कर एक तरह से तकनीक का इस्तेमाल समाज में बदलाव लाने के लिये किया। क्योंकि इससे वे काफी हद तक महिलायों को मैला ढोने की अमानवीय प्रथा से मुक्त कर उन्हे विस्थापित करने में कामयाब हो सके। लेकिन तकनीकी के द्वारा शौचालयों में मानव द्वारा मैला ढोने की ज़रूरत भले ही ना पड़े पर वे छूआछूत की मानसिकता को बदलने के लिये कुछ हद तक ही काम आ सकती है। इसीलिये आज संगठन ने जाति के नाम पर छूआछूत को समाप्त करने के देशव्यापी अभियान ‘‘ अब और छूआछूत नहीं‘‘ की शुरूआत की है।

श्री बिन्देश्वर पाठक का कहना है कि वे ‘अब छूआछूत और नहीं के' अभियान को देश के कोने-कोने में फैलायेगे और लोगों को जातिवाद के खिलाफ जागरूक करेंगे।

'अब छूआछूत और नहीं' अभियान की शुरूआत के अवसर पर गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह का कहना था कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का स्वच्छ अभियान केवल गंदगी दूर करने के लिए नहीं है, बल्कि अस्पृश्यता के खिलाफ एक निर्णायक संघर्ष है। उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि हालांकि देश में छूआछूत को खत्म करने के लिए काफी कुछ किया गया है, लेकिन अब भी बहुत कुछ करना बाकी है। साथ ही साथ उनका यह भी मानना था कि यह संभव है।

सुलभ अंर्तराष्ट्रीय सामाजिक सेवा संगठन के संस्थापक बिन्देश्वर पाठक का मानना है कि जहां एक और शौचालयों के निर्माण से मैला ढोने के काम को मानव द्वारा ना कराये जाने में तकनीकी काम आई है। दूसरी ओर जाति को लेकर छूआछूत को पूरी तरह से खत्म करने के लिये लोगों की मानसिकता बदलने की भी बहुत आवश्यकता हैं।

यह अभियान भीमराव अम्बेडकर की जयंती की पूर्व संध्या पर आयोजित किया गया। भीमराव अंबेडकर का कहना था कि अस्पृश्यता अछूतों के उद्धार के लिए सभी अवसरों के दरवाजे बंद कर देती है। वे उनके लिए समाज में स्वतंत्रता से चलने फिरने के अवसर को खत्म कर देती है और उन्हें अंधकूप और पृथकता की जिन्दगी बसर करने के लिए मजबूर कर देती है। वे उन्हें स्वयं को शिक्षित करने और अपनी मर्जी का व्यवसाय करने से रोकती है। हालांकि आज दलितों की स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन जैसा कि गृहमंत्री ने कहा कि अब भी अस्पृश्यता को खत्म करने के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है। महात्मा गांधी का कहना था कि अस्पृश्यता के खिलाफ उनकी लड़ाई मानवता में अशुद्धता के खिलाफ़ संघर्ष है।

महात्मा गांधी द्वारा छेड़ा गया अस्पृश्यता के खिलाफ अभियान आज भी अधूरा है और ज़रूरत इस अभियान में और तेजी लाते हुए छूआछूत की मानसिकता को जड़ से मिटा दिया जाए ताकि देश के हर नागरिक गरिमा से अपना जीवन यापन कर सकें।

लेखिका सरिता बरारा स्वतंत्र पत्रकार हैं।

 

Source:  http://pib.nic.in/newsite/hindifeature.aspx